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​माँ थावेवाली की कथा – Maa Thawewali Ki Katha

Jai Maa Thawewali
जय माँ थावेवाली

माँ दुर्गा तीनो लोको में सर्व शक्तिमान है।  ब्रहमांड में मौजूद हर तरह की शक्ति इन्ही की कृपा से प्राप्त होती है और अंत में इन्ही में समाहित हो जाती है  इसीलिए माता दुर्गा को आदि शक्ति भी कहा जाता है देवताओ ने भी जब राक्षसों के साथ युद्घ में स्वयं को कमजोर महसूस किया तब माँ दुर्गा ने उनके शरणागत होने पर प्रचंड रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और देवताओ एवं धर्म की रक्षा की।

इस जगत की पालनहार माता ही है जिनकी कृपा से सबकुछ होता है। इसलिए इन को जगत जननी भी कहा जाता है। माँ दुर्गा अपने भक्तो और धरती पर धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए अनेक रूप के प्रकट हुई है । भक्तगण इनको अलग-अलग रूपों और अलग-अलग नामो से पूजते है । कोई शीतला माता, कोई काली माता, कोई मंगला माता तो कोई माँ वैष्णवी के रूप में पूजता है। माँ दुर्गा के अनेक रूप और नाम है। माँ के इन्ही अनेक रूपों और नमो में से एक माँ थावेवाली भी है।

बिहार राज्य के गोपालगंज शहर से मात्र 6 किलोमीटर की दुरी पर सिवान जानेवाले राष्ट्रिये राजमार्ग पर थावे नाम का जगह है वही माता थावेवाली का प्रसिद्द मंदिर है। माँ थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, रहषु भवानी और थावे भवानी भी कहा जाता है।  माँ थावेवाली असम के कामरूप से जहाँ माँ कामख्या का बड़ा प्राचीन और भव्य मंदिर है थावे आई थी इसलिए इनको कावरू कामख्या भी कहा जाता है।

प्राचीन काल में थावे में माता कामख्या के बहुत सचे भक्त श्री रहषु भगत जी रहते थे। वो माता की बहुत सच्चे मन से भक्ति करते थे और माता भी उनकी भक्ति से प्रसन्न थी। माता की कृपा से उनके अन्दर बहुत सी दिव्य शक्तिया भी थी। लेकिन वहा के तत्कालीन राजा मनन सिंह को उनकी भक्ति पसंद नहीं थी। वो रहषु भगत जी को ढोंगी-पाखंडी समझते थे । एक दिन राजा ने अपने सैनिको को रहषु भगत जी को पकड़कर दरबार में लाने का आदेश दिया ।  दरबार में आने पर राजा ने रहषु भगत जी को ढोंगी-पाखंडी आदि अभद्र शब्दों का प्रयोग कर अपमानित किया और उनके माता के सच्चे भक्त होने का मजाक उडाया । रहषु भगत जी ने राजा को विनम्रता पूर्वक समझाया की माता की कृपा से ही मै सबकुछ करता हूँ और मेरी भक्ति से प्रसन्न होकर वो मुझे दर्शन भी देती है । राजा मनन सिंह के घर भी माता की पूजा होती थी लेकिन माता ने कभी दर्शन नही दिया था और चुकी रहषु भगत जी एक अछूत जाती के थे और माता उनको दर्शन देती है ये बात रहषु भगत जी से सुनते ही राजा अत्यंत क्रोधित हो उठे और भगत जी को चुनौती दिए की यदि तुम वास्तव में माता के सच्छे भक्त हो तो मेरे सामने माता को बुलाकर दिखाओ नहीं तो तुम्हे दंड दिया जायेगा । भगत जी ने राजा को बार-बार और विनम्रता पूर्वक समझाया की महाराज अगर माता प्रकट हो गई तो अनर्थ हो जायेगा इसलिए आप अपना हठ छोड़ दीजिये और सच्चे मन से माता की भक्ति कीजिये । लेकिन राजा मनन सिंह अपने हठ पर अडे रहे । अब भगत जी के पास माता को बुलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था । भगत जी ने माता का आह्वाहन किया । माता ने कामरूप से प्रस्थान किया और कोलकाता, पटना, आमी आदि स्थानों से होते जहाँ वो क्रमश: काली, पटनदेवी, अमिका भवानी आदि नमो से प्रसिद्ध है, थावे पहुची । माता ने भगत जी के मस्तक को फाड़कर अपना कंगन दिखाया । उनके आगमन से पुरे राज्य में प्रलय जैसी स्थिति हो गई । राजा और उनके राज-पाट का अंत हो गया ।

माता ने जहा दर्शन दिया वही उनके मंदिर का निर्माण किया गया । रहशु भगत जी मंदिर भी माता के मंदिर के पास ही है । यह कहा जाता है की माँ थावेवाली के दर्शन के पश्चात रहशु भगत जी का दर्शन भी अवश्य करना चाहिए तभी माता प्रसन्न होती है ।

माँ थावेवाली बहुत दयालु और कृपालु है । अपने शरण में आये हुवे सभी भक्तो का कल्याण करती है । हर सुख-दुःख में लोग माँ के शरण में जाते है और करुणामई माँ किसी को भी निराश नहीं करती है सबकी मनोकामना पूरी करती है । थावे के आस-पास किसी के घर शादी-व्याह जैसा शुभकार्य हो या किसी को कोई दुःख बीमारी हो हल परिस्थिति में लोग माता की शरण में जाते है और माता उनका कार्य सिद्ध करती है मंगल करती है । माँ हर घडी और हर सुख-दुःख में अपने भक्तो पर करुणा और ममता की छाँव रखती है ।
देश-विदेह में रहने वाले लोग जब साल-दो साल पर अपने घर आते है तो सबसे पहला और सबसे महतापूर्ण काम होता है माता थावेवाली का दर्शन करना । उनसे अपने और अपनों के लिए सुखद और समृद्ध जीवन की कामना करना । प्रतिदिन हजारो की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते है और अपनी मनोकामनाये पूरी करते है । परन्तु अफ़सोस इस बात की है की इतना अधिक आस्था और श्रधा का केंद्र होते हुवे भी इस स्थान का विकाश और व्यस्था जितना बढ़िया होना चाहिए उतना नहीं हुआ है । आज भी तीर्थयात्रियों के लिए दर्शन और विश्राम आदि की संतोषजनक व्यवस्था नहीं हो पायी है । और यह स्थान इतना प्रचीन होते हुवे भी एक क्षेत्र विशेष तक ही सिमित है । अतः आम जनता और प्रशासन को मिल-जुल कर माता के स्थान का समुचित विकाश और व्वस्था करना चाहिए ताकि थावे वाली माता का स्थान विश्व के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बन कर सामने आये ।

थावे की चर्चा हो तो वहा के प्रशिद्ध और अति स्वादिष्ट मिठाई पुडिकिया को कैसे भुलाया जा सकता है । आप जब भी थावे जाये पुदुकिया मिठाई अवश्य खाये ।

जय माता की !

– अजीत तिवारी
काशी टेंगराही, गोपालगंज
www.jaimaathawewali.com

 

सिंहासनी भवानी माँ थावेवाली की ​आरती

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सिंहासनी भवानी माँ थावेवाली की ​आरती

ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी
काटे संकट देवे करू, होवे पूर्ण मंशा मन-मानी
कतरा घास के धान बनावें, रहशु जी जब ध्यान लगावें
सात बाघ दायें झरे चावल, शक्ति सबने माँ की जानी
ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी

कामख्या, आमी, घोड़ाघाट, सात जगह को अपनी माँ
मस्तक फाड़ी निकाली हाथ, भक्त रहषु जी की बनी कहानी
ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी

मन चाहा फल पावे, जब मन-मुख बोले माँ की बानी
ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी

लीजे हर संकट हमार, कीजै मईया स्वपन साकार
सबकी झोली भरने वाली, हे मईया देवी दानी
ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी

आप जहाँ वहाँ प्रकाश, स्वीकारो पूजा हे महारानी
ॐ जय माँ थावेवाली सुमिरौ जो सिंहासनी भवानी

—:जय माँ थावेवाली:—

स्रोत : ‘रहषु भगत की अमर कहानी’ पुस्तक से संकलित

सिंहासनी भवानी माँ थावेवाली की ​प्रार्थना

Maa Thawewali
सिंहासनी भवानी माँ थावेवाली की ​प्रार्थना

ॐ शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी  नमोस्तुते ।
श्री स्कन्दमाता महागौरी पूजत गणेश ॥

ॐ काण्मांडा कालरात्रि नमोस्तुते ।

श्री चंद्रघण्​टा ध्यावत ब्रह्माविष्णुमहेश ॥

ॐ कात्यायनी सिद्धरात्रि नमोस्तुते ।

श्री महाकाली  तेरा रूप अनेक ॥

ॐ सिंहासनी भवानी थावे वाली नमोस्तुते ।
शत्रु संहारो मेरे निवारो दुःख क्लेश ॥

—:जय माँ थावेवाली :—

स्रोत : ‘रहषु भगत की अमर कहानी’ पुस्तक से संकलित

About me

About me

Ramanavami
27th March 2007
Jai Mata Ki

Everyone in this world dreams to do something and to get something. One decade ago when I visited a website for the first time in my life, I also had a dream to develop a website, by the blessing of Maa Thawewali, now I have finally done it and my dream has come true. I am starting a new phase of my professional life in special reference of a website and this particular website is dedicated in the holy feet of almighty Maa Thawewali. I am feeling fortunate myself to get this great opportunity. I am also feeling lucky to think that I belong to that holy place where almighty Maa is present.

I am thankful to my younger brother and all of my friends who have contributed their worthy suggestions and co-operations for developing this website and without whom I could not made this website so fabulous, I wish Maa would bless all of them.

You all are heartily requested to let me know your worthy suggestions to make this website the best one of its kind. Please feel free to contact me, my E-mail ID is admin@jaimaathawewali.com.

“JAI MATA KI”

Ajit Kumar Tiwari
Gopalganj-New Delhi
Administrator & Developer
www.jaimaathawewali.com

Origins of Maa Durga

mahishasurmardini

Origins of Maa Durga

MAA DURGA is a ferocious form of Devi, the Mother Goddess, the all-powerful almighty goddess. Once the Gods could not defeat the buffalo demon Mahishasur, who was threatening the existence of the universe, the Gods were afraid of this water-buffalo bull because neither Vishnu nor Shiva could prevail against him. They begged lord Shiva for his assistance, and Shiva advised all the Gods to release their shaktis as it was seemed that the joint energy of shakti was only capable of vanquishing Mahishasur.

The shaktis of the Gods emerged in female form. Which arose a splendid Goddess with many arms, she was as beautiful as she was lethal andit was the ten-armed who went out to do battle.

The Gods called this Goddess DURGA, the invincible one. MAA DURGA was born fully-grown and is depicted as exceptionally beautiful and full of rage.

Gods armed her with all their weapons. Thus armed, MAA DURGA rode to the top of a mountain on a lion. In a bloody battle, she defeated Mahishasur and his army of demons and thus saved the Universe from this demon’s menace.

Therefore, MAA DURGA is also called Mahishasuramardini (the demolisher of Mahishasur). This holy battle has come to symbolise the triumph of Good over Evil.

DURGA PUJA is observed in her honor, to celebrate her victory over evil.